अमेरिकी सेना ने समुद्र के बीचों-बीच ड्रग्स तस्करी को रोकने के लिए एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। ड्रग्स से लदी एक नाव पर सीधा मिसाइल हमला किया गया। इस स्ट्राइक में दो लोगों की जान चली गई। जब हम समुद्र में सुरक्षा और नशीली दवाओं के खिलाफ युद्ध की बात करते हैं, तो अक्सर कोस्ट गार्ड के पीछा करने या छोटे हथियारों के इस्तेमाल की खबरें आती हैं। लेकिन इस बार कहानी अलग है। यह मामला सिर्फ तस्करी रोकने का नहीं बल्कि सैन्य ताकत के इस्तेमाल का है।
अमेरिका की इस कार्रवाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ड्रग्स तस्करी रोकने के लिए मिसाइल का इस्तेमाल जायज है? समुद्र के अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत इसकी क्या जगह है? ड्रग्स से लदी नाव पर अमेरिका का मिसाइल हमला और उसके बाद दो मौतों की खबर केवल एक हेडलाइन नहीं बल्कि एक खतरनाक ट्रेंड की शुरुआत हो सकती है।
समुद्र में अमेरिकी स्ट्राइक के पीछे का सच
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) की रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह ऑपरेशन उन इलाकों में हुआ जहाँ तस्करी के रूट सीधे तौर पर आतंकी संगठनों या अस्थिर सरकारों की फंडिंग से जुड़े होते हैं। जब कोई नाव चेतावनी के बावजूद नहीं रुकती या उसमें विस्फोटक होने का अंदेशा होता है, तो अमेरिकी नौसेना घातक हथियारों का सहारा लेती है।
इस बार निशाना एक ऐसी नाव थी जो भारी मात्रा में नशीले पदार्थ ले जा रही थी। दो लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। सवाल उठता है कि क्या उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता था? समुद्र में लहरों के बीच ऑपरेशन करना जोखिम भरा होता है। अक्सर तस्कर पकड़े जाने के डर से नाव को खुद उड़ा देते हैं या सुरक्षा बलों पर फायरिंग शुरू कर देते हैं। अमेरिकी अधिकारियों का तर्क है कि यह हमला आत्मरक्षा या बड़े खतरे को टालने के लिए किया गया।
अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में ताकत का प्रदर्शन
समुद्र के अपने कानून होते हैं। इन्हें यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी (UNCLOS) कहा जाता है। नियम कहते हैं कि तस्करी रोकने के लिए बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए। लेकिन अमेरिका अक्सर इन नियमों को अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं के हिसाब से देखता है।
तस्करों के खिलाफ मिसाइल दागना एक बड़ा मैसेज है। यह केवल उन दो लोगों के बारे में नहीं था जिनकी जान गई। यह मैक्सिकन कार्टेल्स और उन तमाम नेटवर्क के लिए चेतावनी है जो समुद्र के रास्ते अमेरिका में जहर भेजने की कोशिश कर रहे हैं। ड्रग्स कार्टेल्स अब हाई-टेक हो चुके हैं। उनके पास सेमी-सबमर्सिबल नावें (नारको-सब्स) हैं जो रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आतीं। जब तकनीक फेल होने लगती है, तो सेना मिसाइल का रुख करती है।
क्या यह युद्ध की नई परिभाषा है
नशीले पदार्थों के खिलाफ लड़ाई अब अपराध नियंत्रण से हटकर सैन्य ऑपरेशन बनती जा रही है। अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि पिछले कुछ सालों में कोस्ट गार्ड की जगह नौसेना के डिस्ट्रॉयर्स का इस्तेमाल बढ़ा है। मिसाइल का उपयोग यह दिखाता है कि अमेरिका अब ड्रग तस्करी को केवल क्राइम नहीं बल्कि 'नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट' मान रहा है।
मौत के आंकड़े अक्सर ठंडे होते हैं। दो लोग मर गए। उनके पीछे कौन था? क्या वे मजदूरी करने वाले मछुआरे थे जिन्हें कार्टेल्स ने लालच दिया था या वे पेशेवर अपराधी थे? ये सवाल अक्सर फाइलों में दब जाते हैं। सच तो ये है कि जब तक मांग बनी रहेगी, तब तक सप्लाई के रास्ते चलते रहेंगे। चाहे आप कितनी भी मिसाइलें दाग लें।
तस्करी के नए और खतरनाक तरीके
आज के तस्कर पुराने ढर्रे पर काम नहीं करते। उनके पास ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम और सैटेलाइट फोन होते हैं। वे जानते हैं कि अमेरिकी गश्ती दल कहाँ तैनात हैं।
- सेमी-सबमर्सिबल नावें: ये पानी की सतह से बस कुछ इंच ऊपर रहती हैं। इन्हें दूर से देख पाना नामुमकिन है।
- गो-फास्ट बोट्स: इनमें तीन से चार शक्तिशाली इंजन लगे होते हैं। इनकी रफ्तार का मुकाबला करना साधारण जहाजों के बस की बात नहीं।
- ड्रोन निगरानी: अब कार्टेल्स भी ड्रोन्स का इस्तेमाल करके सुरक्षा बलों की लोकेशन ट्रैक कर रहे हैं।
अमेरिकी सेना ने जब मिसाइल दागी, तो मुमकिन है कि वह नाव पकड़ने के लिहाज से बहुत तेज रही हो। या शायद उसमें इतना गोला-बारूद था कि उसे पास से रोकना सुरक्षा बलों के लिए घातक हो सकता था।
मानवाधिकार और नैतिकता का टकराव
दो लोगों की मौत पर मानवाधिकार संगठन सवाल उठा सकते हैं। बिना मुकदमे के समुद्र में मौत की सजा देना कानून की किताब में कहीं नहीं लिखा। पर जमीनी हकीकत क्रूर है। फेंटानिल और हेरोइन जैसी ड्रग्स हर साल अमेरिका में हजारों लोगों की जान लेती हैं। सरकारें इसे एक साइलेंट वॉर मानती हैं। इस युद्ध में नियम थोड़े लचीले हो जाते हैं।
ईमानदारी से कहें तो ये कोई पहली बार नहीं हुआ है। बस इस बार मिसाइल का इस्तेमाल इतना सीधा और घातक था कि खबर दब नहीं पाई। समुद्र में अक्सर मुठभेड़ होती है, नावें डूबती हैं और लोग लापता हो जाते हैं। उन्हें 'कोलेटरल डैमेज' कहकर भुला दिया जाता है।
क्या मिसाइल दागने से तस्करी रुक जाएगी
इतिहास गवाह है कि केवल हथियारों से तस्करी नहीं रुकी। आप एक नाव डुबोएंगे, कल चार और निकलेंगी। ड्रग्स का व्यापार मुनाफे पर टिका है। एक सफल खेप पूरे साल का नुकसान वसूल कर लेती है। अमेरिका को अपनी रणनीति बदलनी होगी। सिर्फ सप्लाई चेन पर प्रहार करना काफी नहीं है। जब तक ड्रग्स की मांग कम नहीं होगी, समुद्र में खून बहता रहेगा।
नौसेना की यह कार्रवाई एक शॉर्ट-टर्म समाधान है। यह डराने के लिए अच्छी है, लेकिन जड़ काटने के लिए नहीं। कार्टेल्स के पास पैसों की कमी नहीं है। वे जान गंवाने वाले लोगों को बस एक संख्या मानते हैं। उनके लिए उन दो लोगों की मौत का कोई मतलब नहीं है, सिवाय इसके कि एक खेप पकड़ी गई।
सुरक्षा बलों के सामने मौजूद चुनौतियाँ
समुद्र में गश्त करना भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसा है। अटलांटिक और प्रशांत महासागर का विस्तार इतना बड़ा है कि हर नाव पर नजर रखना नामुमकिन है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियां सैटेलाइट डेटा और मुखबिरों पर निर्भर रहती हैं। जब सटीक सूचना मिलती है, तभी ऐसे ऑपरेशन अंजाम दिए जाते हैं।
मिसाइल दागने का फैसला बहुत ऊपर के स्तर से आता है। यह संयोग नहीं था। यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। अमेरिका दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। भले ही इसके लिए उसे अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में बमबारी ही क्यों न करनी पड़े।
भविष्य में हमें ऐसे और भी मामले देखने को मिल सकते हैं। जैसे-जैसे कार्टेल्स अधिक आक्रामक होंगे, जवाब भी उतना ही हिंसक होगा। आप इसे पसंद करें या न करें, लेकिन समुद्र अब ड्रग्स के खिलाफ एक एक्टिव वॉर जोन बन चुका है। अगली बार जब आप ऐसी खबर सुनें, तो समझ जाइएगा कि यह सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि एक अघोषित युद्ध का हिस्सा है।
ड्रग्स के खिलाफ इस तरह के सैन्य अभियानों की निगरानी के लिए अब स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निकायों की जरूरत है। शक्ति का अनियंत्रित उपयोग अक्सर निर्दोषों को चपेट में ले लेता है। अगर अमेरिका इसी राह पर चलता रहा, तो अन्य देश भी अपने समुद्री क्षेत्रों में इसी तरह की मनमानी शुरू कर सकते हैं। यह वैश्विक समुद्री सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती है।
समुद्र में सुरक्षा बनाए रखने के लिए केवल मिसाइलें काफी नहीं हैं। इसके लिए देशों के बीच बेहतर समन्वय और खुफिया जानकारी साझा करने की जरूरत है। अगर आप सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं, तो नशीले पदार्थों के स्रोतों और उनके पीछे बैठे सफेदपोश अपराधियों पर वार करना होगा, न कि सिर्फ उन प्यादों पर जो नाव चला रहे हैं। अपनी सुरक्षा के लिए सतर्क रहें और इस तरह के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर नजर रखें क्योंकि इनका असर आपकी गलियों और समाज तक पहुंचता है।