क्यों अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं

क्यों अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं

पश्चिम एशिया में बारूद की गंध नई नहीं है। लेकिन इस बार हालात बहुत ज्यादा गंभीर हो चुके हैं। अमेरिकी हमलों के बाद तेहरान का रुख बेहद आक्रामक है। लोग सोशल मीडिया पर लगातार US Iran War की आशंका जता रहे हैं। हर कोई पूछ रहा है कि क्या दोनों देश सीधे टकराव की ओर बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि अब कूटनीति के सारे रास्ते बंद दिख रहे हैं। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह वाशिंगटन से कोई बात नहीं करेगा। यह सिर्फ एक बयान नहीं है। यह आने वाले एक बड़े संकट का संकेत है।

जब भी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, दुनिया भर के बाजार कांपने लगते हैं। तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। लेकिन इस संकट की जड़ें काफी गहरी हैं। वाशिंगटन सोचता है कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाया जा सकता है। यह उनकी सबसे बड़ी भूल है। ईरान का इतिहास गवाह है कि वह बाहरी दबाव में कभी नहीं झुकता। अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने ईरान के भीतर राष्ट्रवाद की एक नई लहर पैदा कर दी है। अब वहां की सरकार के पास पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं बचा है।

अमेरिका ईरान युद्ध की आशंका और तेहरान का सख्त रुख

सैन्य हमले हमेशा समस्याओं को सुलझाने के बजाय उन्हें और उलझा देते हैं। हालिया अमेरिकी कार्रवाई ने भी यही किया है। ईरान के सर्वोच्च नेता और शीर्ष अधिकारियों ने साफ़ तौर पर कहा है कि वे बंदूक की नोक पर बातचीत की मेज पर नहीं बैठेंगे। वे इसे अपनी संप्रभुता का अपमान मानते हैं। यह रुख वाशिंगटन के उन रणनीतिकारों के लिए एक करारा जवाब है जो सोचते थे कि प्रतिबंध और हमले ईरान को बातचीत के लिए मजबूर कर देंगे।

ईरान की मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय नेटवर्क को कम करके नहीं आंका जा सकता। लेबनान में हिजबुल्लाह से लेकर यमन में हूतियों तक, ईरान के पास पूरे क्षेत्र में खेलने के लिए कई पत्ते हैं। अगर अमेरिका को लगता है कि वह सिर्फ हवाई हमलों से ईरान को पंगु बना सकता है, तो वह हकीकत से कोसों दूर है। ईरान ने अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत किया है। उसने साफ़ कर दिया है कि किसी भी अगले दुस्साहस का जवाब बहुत भयानक होगा।

बातचीत की मेज पर लौटने की शर्तें अब पूरी तरह बदल चुकी हैं। ईरान अब केवल प्रतिबंध हटाने की मांग नहीं कर रहा है। वह अब अमेरिकी सैनिकों की क्षेत्र से पूरी वापसी चाहता है। यह एक ऐसी मांग है जिसे अमेरिका कभी स्वीकार नहीं करेगा। नतीजा यह है कि गतिरोध अब पूरी तरह से टूट चुका है। दोनों पक्ष एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां से वापसी का रास्ता खोजना लगभग असंभव है।

क्यों फेल हो रही है अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता

कई यूरोपीय देशों और क्षेत्रीय ताकतों ने इस तनाव को कम करने की कोशिश की। ओमान और कतर जैसे देश हमेशा की तरह पर्दे के पीछे सक्रिय थे। लेकिन इस बार उनकी कोशिशें नाकाम साबित हुईं। इसका कारण बहुत सीधा है। दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि उसे पाटना मुमकिन नहीं है। जब एक पक्ष सीधे हमले कर रहा हो, तो दूसरा पक्ष टेबल पर बैठकर चाय नहीं पी सकता।

ईरान के भीतर भी राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं। वहां के कट्टरपंथियों का हाथ अब बहुत मजबूत हो चुका है। वे लंबे समय से कह रहे थे कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता। साल 2018 में परमाणु समझौते से अमेरिका के अचानक हटने को वे आज भी एक बड़े धोखे के रूप में देखते हैं। इसलिए अब तेहरान में कोई भी नेता दोबारा वही गलती दोहराने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।

वैश्विक शक्तियों का रुख भी इस बार अलग है। रूस और चीन अब खुलकर ईरान के आर्थिक और रणनीतिक साझेदार बन चुके हैं। वे अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों को चुनौती दे रहे हैं। इस बाहरी समर्थन ने ईरान के हौसले को और बढ़ा दिया है। उसे पता है कि वह पूरी तरह अकेला नहीं है। जब आपके पास मजबूत दोस्तों का साथ हो, तो आप दुश्मन की हर धमकी के आगे नहीं झुकते।

तेल की राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर

यह लड़ाई सिर्फ मिसाइलों और बयानों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान ने कई बार चेतावनी दी है कि अगर उसकी सुरक्षा को खतरा हुआ, तो वह इस मार्ग को बंद कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया में हाहाकार मच जाएगा।

कच्चे तेल की कीमतें पलक झपकते ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। इससे विकासशील देशों में महंगाई का एक नया चक्र शुरू हो जाएगा। भारत जैसे देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक होगी। घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे, जिससे हर चीज महंगी हो जाएगी। इसलिए यह युद्ध सिर्फ दो देशों का नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सिरदर्द है।

हवाई हमलों से कभी शांति नहीं आ सकती। इतिहास गवाह है कि मध्य पूर्व में जितने भी सैन्य हस्तक्षेप हुए हैं, उनके परिणाम विनाशकारी रहे हैं। इराक और अफगानिस्तान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। अमेरिका को समझना होगा कि ईरान कोई कमजोर देश नहीं है। उसके पास एक अनुशासित सेना और अत्याधुनिक हथियार हैं। किसी भी तरह का पूर्ण युद्ध पूरे क्षेत्र को तबाही की आग में झोंक देगा।

इस समय सबसे बड़ी जरूरत एक व्यावहारिक दृष्टिकोण की है। अमेरिका को अपनी एकतरफा कार्रवाई और धमकियों की नीति को छोड़ना होगा। वहीं ईरान को भी यह समझना होगा कि पूरी तरह से बातचीत का बहिष्कार करना संकट को और बढ़ा सकता है। हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए इसकी उम्मीद बहुत कम है। दोनों ही देश इस समय अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

खतरे की घंटी बज चुकी है। वैश्विक समुदाय को अब मूकदर्शक बने रहने के बजाय सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति हाथ से निकल जाएगी। यह समय बयानों की आड़ में छिपने का नहीं बल्कि जमीन पर ठोस कदम उठाने का है। दुनिया एक और बड़े युद्ध का बोझ उठाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं है।

SP

Sofia Patel

Sofia Patel is known for uncovering stories others miss, combining investigative skills with a knack for accessible, compelling writing.