ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान जब मंच पर आकर यह कहते हैं कि 'तय की गई ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाने की प्रतिबद्धता ज़रूरी है', तो मुख्यधारा की मीडिया इसे एक बड़ा प्रशासनिक सुधार मान लेती है। यह एक सतही सोच है। नौकरशाही को जवाबदेह बनाने का यह घिसा-पिटा नैरेटिव असलियत को छुपाने की एक नाकाम कोशिश है। ईरान की प्रशासनिक विफलता का कारण अधिकारियों की कम प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि वह ढांचागत विरोधाभास है जिसके तहत यह पूरी व्यवस्था काम करती है।
सुधार की बातें करना आसान है। लेकिन जब व्यवस्था ही अंदर से सड़ चुकी हो, तो केवल नियमों का पालन करने की दुहाई देना एक प्रशासनिक मज़ाक बनकर रह जाता है।
दोहरी सत्ता का खेल और पंगु राष्ट्रपति
ईरान के राजनीतिक ढांचे को समझने वाले जानते हैं कि वहाँ असली ताक़त कहाँ निवास करती है। ईरान में एक तरफ़ चुनी हुई सरकार है और दूसरी तरफ़ 'इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई का नियंत्रण है। जब पेज़ेशकियान प्रशासनिक जवाबदेही की बात करते हैं, तो वे उस हाथी को नज़रअंदाज़ कर रहे होते हैं जो सीधे कमरे के बीचों-बीच खड़ा है।
इतिहास गवाह है कि ईरान में जब भी किसी राष्ट्रपति ने व्यवस्था को सुधारने की कोशिश की, उसे सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व के वीटो का सामना करना पड़ा। मोहम्मद खातमी ने 1997 से 2005 के बीच 'नागरिक समाज' और संस्थागत सुधारों का नारा दिया था। नतीजा क्या हुआ? उनके कार्यकाल के अंत तक न्यायपालिका और IRGC ने उनके हर बड़े फैसले को पलट दिया। पेज़ेशकियान का यह सोचना कि केवल 'प्रतिबद्धता' से काम बदल जाएगा, प्रशासनिक नासमझी की पराकाष्ठा है।
प्रशासनिक दक्षता तब तक नहीं आ सकती जब तक कि फैसले लेने वाले अधिकारियों को यह डर सताता रहेगा कि उनका एक सही लेकिन लीक से हटकर लिया गया फैसला उन्हें मज़हबी कट्टपंथियों के निशाने पर ला सकता है। ईरान में नीति निर्धारण तर्कसंगत आर्थिक सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि वैचारिक वफ़ादारी पर तय होता है।
कागज़ी जवाबदेही बनाम ज़मीनी हकीकत
मुख्यधारा के विश्लेषक अक्सर पूछते हैं: "ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर क्यों नहीं ला पा रहा?" वे सोचते हैं कि शायद मंत्रियों में प्रबंधन कौशल की कमी है। यह पूरी तरह से गलत सवाल है। असली सवाल यह होना चाहिए: "क्या ईरान की व्यवस्था वास्तव में एक कुशल अर्थव्यवस्था चाहती भी है?"
ईरान की अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा—कुछ अनुमानों के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक—धार्मिक ट्रस्टों (बोनयाद) और IRGC के नियंत्रण में है। ये संस्थाएँ किसी भी चुनी हुई सरकार या ऑडिट कमेटी को जवाबदेह नहीं हैं। ये टैक्स नहीं देतीं और इनका मुख्य उद्देश्य देश का विकास नहीं, बल्कि वैचारिक एजेंडे को जीवित रखना है।
जब राष्ट्रपति अपने मंत्रियों को 'तय ज़िम्मेदारियां' निभाने की हिदायत देते हैं, तो वे असल में उन मंत्रियों को एक ऐसे युद्ध में भेज रहे होते हैं जिसके नियम उनके विरोधी तय करते हैं। आप किसी अधिकारी से कार्यकुशलता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं जब उसके पास समानांतर सत्ता केंद्रों को चुनौती देने का कोई कानूनी अधिकार ही न हो? यह वैसी ही स्थिति है जैसे किसी के हाथ-पैर बांधकर उसे तैरने के लिए कह दिया जाए।
प्रतिबंधों का बहाना और आंतरिक भ्रष्टाचार
ईरानी प्रशासन का पसंदीदा शगल हर नाकामी का ठीकरा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों पर फोड़ना है। यह सच है कि प्रतिबंधों ने बैंकिंग और तेल व्यापार को पंगु बना दिया है, लेकिन प्रतिबंधों की आड़ में जो कालाबाज़ारी और आंतरिक भ्रष्टाचार पनपा है, उसे खुद ईरानी हुक्मरानों ने शह दी है।
तस्करी और समानांतर अर्थव्यवस्था से सबसे ज्यादा फायदा उन्हीं तत्वों को होता है जो खुद को व्यवस्था का रक्षक बताते हैं। एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन इस अवैध कमाई के रास्ते बंद कर देगा। इसलिए, व्यवस्था के भीतर बैठे शक्तिशाली लोग कभी नहीं चाहेंगे कि पेज़ेशकियान की ये बातें कागज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरें। राष्ट्रपति का बयान सिर्फ़ जनता के गुस्से को शांत करने और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को यह दिखाने के लिए है कि सरकार कुछ करने की कोशिश कर रही है।
सुधार की इस सनक का नुकसान
इस खोखली जवाबदेही का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह निचले स्तर के अधिकारियों को पूरी तरह से निष्क्रिय बना देती है। जब हर छोटी गलती पर 'प्रतिबद्धता की कमी' का ठप्पा लगाकर कार्रवाई का डर दिखाया जाएगा, तो अधिकारी नए प्रयोग करना बंद कर देंगे। वे केवल वही फाइलें आगे बढ़ाएंगे जो सुरक्षित हों।
नौकरशाही का यह जड़त्व किसी भी देश को भीतर से खोखला करने के लिए काफी है। ईरान आज इसी दौर से गुज़र रहा है। योग्यता को किनारे करके केवल वफ़ादारी को पैमाना बनाने का नतीजा यह हुआ है कि देश का सबसे बेहतरीन दिमागी टैलेंट विदेशों का रुख कर रहा है।
ईरान को आज किसी नए भाषण या खोखले वादों की ज़रूरत नहीं है। उसे अपने दोहरे सत्ता ढांचे को खत्म करने की ज़रूरत है। लेकिन यह जानते हुए भी कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा, पेज़ेशकियान वही पुराना राग अलाप रहे हैं जिसका अंत पहले ही तय है। जब तक ताक़त का मुख्य स्रोत बिना किसी जवाबदेही के पर्दे के पीछे बैठा रहेगा, तब तक राष्ट्रपतियों के ऐसे बयान महज़ एक और सरकारी दस्तावेज़ बनकर फाइलों में दबे रहेंगे। पेज़ेशकियान का यह प्रशासनिक ढोंग ईरान की जनता को और अधिक निराश करने के अलावा कुछ नहीं करेगा।