डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) से आ रही खबरें डराने वाली हैं। वहां इबोला वायरस पैर पसार चुका है। स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक कांगो में इबोला के मामले 500 पार हो चुके हैं और अब तक 91 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकारी स्तर पर पुष्ट मामलों की कुल संख्या 515 तक पहुंच गई है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है जो पूरी दुनिया के हेल्थ सिस्टम को झकझोर रही है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह वायरस फिर से बेकाबू होने वाला है? सच कहें तो जमीनी हकीकत दावों से कहीं ज्यादा पेचीदा और गंभीर है।
इस बार का संकट इसलिए अलग है क्योंकि यह संक्रमण इबोला के बुंडीबुग्यो (Bundibugyo) स्ट्रेन के कारण फैल रहा है। अगर आप सोच रहे हैं कि पुरानी वैक्सीन काम आ जाएगी, तो आप गलत हैं। इस खास स्ट्रेन के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत टीका या सटीक इलाज मौजूद नहीं है। पूरा दारोमदार केवल मरीजों की जल्द पहचान और उन्हें आइसोलेट करने पर टिका है। Meanwhile, you can read similar developments here: Inside the Fraser Valley ER Crisis Nobody is Talking About.
कांगो में इबोला के मामले 500 पार होने की असली वजह क्या है
जब किसी इलाके में कोई जानलेवा वायरस फैलता है, तो सबसे पहला काम कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग यानी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों की तलाश करना होता है। कांगो में यही व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक प्रभावित प्रांतों में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की दर महज 50.3% है। इसका मतलब है कि आधे से ज्यादा ऐसे लोग जो मरीजों के सीधे संपर्क में आए, वे खुलेआम घूम रहे हैं। जब तक सिस्टम का टारगेट 95% ट्रैकिंग का होता है, तब तक आधी आबादी को ट्रैक करना आग में घी डालने जैसा है।
दूसरी बड़ी मुसीबत है वहां का सशस्त्र संघर्ष। इटुरी प्रांत इस समय इस महामारी का मुख्य केंद्र बना हुआ है। यह इलाका हिंसा और अस्थिरता से जूझ रहा है। सशस्त्र गुटों की मौजूदगी के कारण डॉक्टरों और अंतरराष्ट्रीय सहायता कर्मियों के लिए दूरदराज के गांवों तक पहुंचना करीब-करीब नामुमकिन हो गया है। जब गोलियां चल रही हों, तो पीपीई किट पहनकर सैंपल लेना कितना सुरक्षित होगा? आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। To explore the bigger picture, check out the detailed article by Psychology Today.
चिकित्सा उपकरणों की भारी कमी भी इस आग को भड़का रही है। नॉर्थ कीवू प्रांत में रीएजेंट की कमी के कारण लगभग 193 टेस्ट रिपोर्ट पेंडिंग पड़ी हैं। बिना टेस्ट के आप कैसे तय करेंगे कि किसे क्वारंटाइन करना है और किसे नहीं?
क्या यह वायरस पड़ोसी देशों में भी फैल रहा है
यह बीमारी अब केवल कांगो तक सीमित नहीं रही। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पुष्टि की है कि पड़ोसी देश युगांडा में भी इस आउटब्रेक से जुड़े 19 मामले सामने आ चुके हैं। इसके अलावा अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) ने एक अमेरिकी स्वास्थ्य कर्मी के संक्रमित होने की पुष्टि की है जो कांगो में मरीजों की देखभाल कर रहा था। उसे इलाज के लिए जर्मनी शिफ्ट किया गया है।
इस फैलाव को देखते हुए अमेरिका और अन्य देशों ने कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग सख्त कर दी है। उड़ानों को चुनिंदा एयरपोर्ट्स जैसे न्यूयॉर्क (JFK) और अटलांटा (ATL) पर री-रूट किया जा रहा है। खतरा कगार पर है और इसे हल्के में लेने की भूल भारी पड़ सकती है।
स्थानीय स्तर पर चुनौतियां और सामाजिक प्रतिरोध
तमाम कोशिशों के बावजूद जमीन पर काम करना बेहद मुश्किल हो रहा है। इसके पीछे कुछ व्यावहारिक और सामाजिक कारण हैं जिन्हें समझना जरूरी है।
- पोस्टमार्टम टेस्टिंग का विरोध: स्थानीय समुदायों में पारंपरिक अंतिम संस्कार की रस्में बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इबोला से मरने वालों के शवों की जांच और उनके सुरक्षित अंतिम संस्कार का लोग विरोध कर रहे हैं, जिससे संक्रमण तेजी से फैल रहा है।
- इलाज केंद्रों की बदहाली: स्टैंडर्ड इबोला ट्रीटमेंट सेंटर्स की क्षमता बेहद कम है। मरीजों के रहने और उनके आइसोलेशन के लिए पर्याप्त बेड और टेंट नहीं हैं।
- सप्लाई चेन का टूटना: संक्रमण की रोकथाम के लिए जरूरी सामान जैसे सैनिटाइज़र, ग्लव्स और मास्क की भारी किल्लत है। यूरोपीय संघ ने हाल ही में यूनिसेफ के जरिए 100 टन मानवीय सहायता और दवाएं इटुरी भेजी हैं, लेकिन जरूरत इससे कहीं ज्यादा है।
डाटा के विश्लेषण से पता चलता है कि संक्रमण की दो बड़ी लहरें आईं। पहली लहर 14 मई से 23 मई के बीच दिखी, जो किसी एक साझा सोर्स से फैले संक्रमण की ओर इशारा करती है। इसके बाद 25 मई से 3 जून के बीच मामलों का दूसरा क्लस्टर सामने आया। यह साफ संकेत है कि वायरस अब समाज में अंदर तक धंस चुका है और इसने एक बड़ा 'रिजर्वायर' बना लिया है।
इस संकट से निपटने के लिए आगे क्या करना होगा
अगर इस आउटब्रेक को यहीं नहीं रोका गया, तो यह हाल के सालों की सबसे भीषण वैश्विक स्वास्थ्य आपदा बन सकता है। इंटरनेशनल कम्युनिटी और स्थानीय प्रशासन को तुरंत कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।
सबसे पहले इटुरी और प्रभावित इलाकों में तुरंत युद्धविराम या सुरक्षित कॉरिडोर की व्यवस्था करनी होगी ताकि मेडिकल टीमें बिना किसी डर के काम कर सकें। इसके बिना जमीनी स्तर पर कोई भी योजना कामयाब नहीं हो सकती। इसके साथ ही युगांडा और कांगो के बॉर्डर पर निगरानी को कई गुना बढ़ाना होगा क्योंकि लोगों की आवाजाही वायरस को नए शहरों में पहुंचा रही है। स्थानीय धार्मिक और सामाजिक नेताओं को साथ लेकर लोगों को समझाना होगा कि शवों को छूना इस समय कितना खतरनाक हो सकता है। जब तक समुदाय का भरोसा नहीं जीता जाएगा, तब तक हर सरकारी प्रयास बेकार साबित होगा। रीएजेंट और टेस्टिंग किट्स की सप्लाई को तुरंत सुचारू करना होगा ताकि पेंडिंग पड़े टेस्ट्स के नतीजे आ सकें और संदिग्ध मरीजों को तुरंत आइसोलेट किया जा सके।